सोमवार, 18 सितंबर 2017

Chaar Gazalen

1)
समंदर कितना गहरा देखना हैं
उसे अब कह के दरिया देखना हैं
शजर से रूठ कर ख़ुद ही गया था
कहाँ पहुँचा वो पत्ता देखना हैं
सफ़ाई से जो चिपकाये गये थे
लिखा हैं पन्नों पर क्या देखना हैं
यूँ चीख़ूँगा भले आवाज़ जाए
ज़माना कितना बहरा देखना हैं
हज़ारों में या लाखों में बिकेगा
हैं ईमां कितना महँगा देखना हैं
रहा जो सिर्फ़ मेरा ज़िंदगी भर
रहा उसका मैं कितना देखना हैं
आतिश इंदौरी

2)
आग़ हैं पर धुआँ नहीं होता
वो पढ़ों जो बयाँ नहीं होता
एक दुनिया नई बसानी हैं
शख़्स तन्हा जहाँ नहीं होता
या तो बचपन या बुढ़ापा हैं
बोन्साई जवाँ नहीं होता
दरमियाँ कोई फिर भी होता हैं
कोइ जब दरमियाँ नहीं होता
भीड़ में हूँ तो क्या हुआ आतिश
शख़्स तन्हा कहाँ नहीं होता
आतिश इंदौरी

3)
भला कब हाथ में पत्थर नहीं आया
मगर कोई निशाने पर नहीं आया
कहीं ठहरे नहीं फिर भी शिकायत हैं
सफ़र में ख़ुशनुमा मंज़र नहीं आया
मैं तौबा दोस्ती से कर तो लूँ लेकिन
हमेशा पीठ पे ख़ंजर नहीं आया
बुढ़ापे में हुआ ऐसा भी तो अक्सर
पहुँच के घर लगा की घर नहीं आया
सहा चुप-चाप तूफ़ानों को क्यूँ आतिश
कभी आँखों में क्यों सागर नहीं आया
आतिश इंदौरी

4)
पुरखों का हम मकान बेच आये
धरती और आसमान बेच आये
वो उड़ानों की बात करते हैं
जो परिँदे उड़ान बेच आये
अस्ल किरदार सामने हैं अब
जब से ख़ंजर की म्यान बेच आये
यूँ ग़ुलामी ख़रीद लाये वो
जो जो अपनी ज़बान बेच आये
क्यूँ शिकायत हो धूप से आतिश
अपना जब सायबान बेच आये
आतिश इंदौरी

रविवार, 20 अगस्त 2017

Gazal: समंदर कितना गहरा देखना हैं उसे अब कह के दरिया देखना हैं

समंदर कितना गहरा देखना हैं
उसे अब कह के दरिया देखना हैं

शजर से रूठ कर ख़ुद ही गया था
कहाँ पहुँचा वो पत्ता देखना हैं

सफ़ाई से जो चिपकाये गये थे
लिखा हैं पन्नों पर क्या देखना हैं

यूँ चीख़ूँगा भले आवाज़ जाए
ज़माना कितना बहरा देखना हैं

हज़ारों में या लाखों में बिकेगा
हैं ईमां कितना महँगा देखना हैं

रहा जो सिर्फ़ मेरा ज़िंदगी भर
रहा उसका मैं कितना देखना हैं
आतिश इंदौरी

Sher: समंदर कितना गहरा देखता हूँ उसे अब कह के दरिया देखता हूँ आतिश इंदौरी

समंदर कितना गहरा देखता हूँ
उसे अब कह के दरिया देखता हूँ
आतिश इंदौरी

kuchh sher

दरमियां शर्म रहा करती थी वो गायब हैं
आपने बीच में दीवार उठा ली हैं क्या
आतिश इंदौरी

जिस्म पर मौत लिखा फिर दी गई आज़ादी
उम्र से लम्बी परिंदे को सज़ा दी हैं क्या
आतिश इंदौरी

Sher: अपने लोगों के अगर हाथों में पत्थर होंगे अपने लोगों के ही फिर ख़ूँ से सने सर होंगे आतिश इंदौरी

अपने लोगों के अगर हाथों में पत्थर होंगे
अपने लोगों के ही फिर ख़ूँ से सने सर होंगे
आतिश इंदौरी

Sher: सोचना भी नहीं बिल्कुल भी वफ़ा देने की जब मजा आने लगा हैं मुझे नाकामी में आतिश इंदौरी

सोचना भी नहीं बिल्कुल भी वफ़ा देने की
जब मजा आने लगा हैं मुझे नाकामी में
आतिश इंदौरी

Chaar Gazalen

1) समंदर कितना गहरा देखना हैं उसे अब कह के दरिया देखना हैं शजर से रूठ कर ख़ुद ही गया था कहाँ पहुँचा वो पत्ता देखना हैं सफ़ाई से जो चिपकाय...