रविवार, 10 जून 2018

बुधवार, 6 जून 2018

Gazal: इस तरह से तो ख़ूब समझा है इश्क़ का अर्थ जिस्म होता है

इश्क़ आतिश ने ऐसे बोया है
बीज जैसे किसान बोता है|
इस तरह से तो ख़ूब समझा है
इश्क़ का अर्थ जिस्म होता है|
पत्थरों के नगर नहीं भाये
इसलिये दिल में दर्द बोता है|
चाह मंज़िल की है नहीं शायद
इसलिये राह से भटकता है|
देख कर गुल को आल्हादित हूँ
प्रेम इस तरह से उड़ेला है|
आतिश इंदौरी
Ishqa aatish ne aise boyaa hain
beej jaise kisaan botaa hain.
Is tarah se to khoob samajhaa hai
ishq kaa arth jism hotaa hai.
Pattharon ke nagar naheen bhaaye
isaliye dil men dard botaa hai.
Chaah manzil kee hai naheen shaayad
isaliye raah se bhatakataa hai.
Dekh kar gul ko aalhaadit hoon
prem is tarah se udelaa hai
aatish indori

सोमवार, 4 जून 2018

दर्द के साथ तुम भी आते हों जौन तुम याद आ ही जाते हों

दर्द के साथ तुम भी आते हों
जौन तुम याद आ ही जाते हों

ख़्वाब की तरह रात आते हो
ख़्वाब की तरह सुब्‍ह जाते हो
आतिश इंदौरी

गुरुवार, 31 मई 2018

Gazal: इश्क़ जाये तो नूर जाता हैं दिल पे छाया सुरूर जाता हैं

इश्क़ जाये तो नूर जाता हैं
दिल पे छाया सुरूर जाता हैं।
कोशिशे रोकने की मत करना
दूर फिर वो जरूर जाता हैं।
मैं उसे खो न दूँ हैं डर उसको
इसी कारण वो दूर जाता हैं।
कोशिशे रोकने की होंगी ही
हाथ से कोह-ए-नूर जाता हैं।
ख़ूब आलोचना करों आतिश
ऐसे सर से ग़ुरूर जाता हैं।
आतिश इंदौरी

Ishqa jaaye to noor jaataa hain
dil pe chhaayaa suroor jaataa hain.
Koshishe rokane kee mat karanaa
door fir vo jaroor jaataa hain.
Main use kho n doon hain dar usako
isee kaaran vo door jaataa hain.
Koshishe rokane kee hongee hee
haath se koh-e-noor jaataa hain.
Khoob aalochanaa karon aatish
aise sar se guroor jaataa hain.
aatish indori

बुधवार, 30 मई 2018

Gazal: क्यूँ भला उसके ख़्वाब से गुजरूं क्यूँ भला गर्म आब से गुजरूं

क्यूँ भला उसके ख़्वाब से गुजरूं
क्यूँ भला गर्म आब से गुजरूं

बेवफ़ा कौन था? मैं था की वो
रोज़ इस पेच-ओ-ताब से गुजरूं

की मैं लौहे से बन सकूँ सोना
किस तरह के दबाब से गुजरूं

इश्क़ में सिर्फ़ उपकरण हो जिस्म
रूह के आब ओ ताब से गुजरूं

इश्क़ ओ सी डी बन गया आतिश
रात दिन इज़्तिराब से गुजरूं
आतिश इंदौरी

रविवार, 27 मई 2018

Gazal: जोश ख़ूँ में हैं कम बहुत दिन से हैं बिना सर के हम बहुत दिन से

जोश ख़ूँ में हैं कम बहुत दिन से
हैं बिना सर के हम बहुत दिन से

दस मिनट की बहुत हैं ग़म-ख़्वारी
शुक्र हैं ग़म हैं कम बहुत दिन से

और कोई पसंद आया क्या
मिलना जुलना हैं कम बहुत दिन से

अब किसी और के हों के जीते हैं
यूँ भी खुद के थे हम बहुत दिन से

तय हैं मुझको वफ़ा तलाशेगी
बेवफ़ा जो हैं हम बहुत दिन से

इक समंदर नहीं चुराया हैं
यूँ ही आँखे हैं नम बहुत दिन से.
आतिश इंदौरी

Sher: गुनाह-ए-इश्क़ का चालान भरना है लहू दे के मुझे तावान भरना हैं

गुनाह-ए-इश्क़ का चालान भरना है लहू दे के मुझे तावान भरना हैं आतिश इंदौरी