मंगलवार, 7 नवंबर 2017

Gazal: आसानी से पल जाते हैं जो सांचे में ढल जाते हैं aatish indori

आसानी से पल जाते हैं
जो सांचे में ढल जाते हैं

लम्हें मुश्किल है बतलाना
ख़ामोशी में ढल जाते हैं

कल फिर परसों करते करते
काम यूँ बरसों टल जाते हैं

मिलना होता भी तो कैसे
रोज़ यही की कल जाते हैं

जीवन लकड़ी साँसे धुकनी
हर पल थोड़े जल जाते हैं
आतिश इंदौरी

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

8 Gazalen

1
वही बातें कहाँ हूँ और किधर हूँ
यूँ तो नज़रों से उनकी तरबतर हूँ

सुनो कि नौजवां मैं इक शजर हूँ
हुआ क्या बोन्साई जो अगर हूँ

सलीक़े से कभी मत खटखटाना
समझ ले कि तवाइफ़ का मैं घर हूँ

मुझे ग़म-ख़्वार का किरदार मत दे
कहानी में तेरी शामिल अगर हूँ

अमीरों को ग़रीबों से मिलाती
पुराने बांध की मैं इक नहर हूँ

कबाड़ी लोग दीवाने हैं आतिश
कोई मैं लौह लंगर या कटर हूँ
आतिश इंदौरी

2
बुद्ध होने की मुनादी पीटते हैं
वो जो लानत सुन के ताली पीटते हैं

रोशनी को चाहिये कोई सनद क्या
इश्क़ वाले क्यूँ मुनादी पीटते हैं

जानवर रोते नहीं दिखते यहां पर
आदमी हर वक़्त छाती पीटते हैं

इस तरह हैं जश्ने आज़ादी में शामिल
लोग जो भूके हैं थाली पीटते हैं

सिर से लेकर पैर अमीरी में हैं जिनके
वो गरीबी की मुनादी पीटते हैं

शेर अच्छा था बुरा था जानूं कैसे
लोग कुछ बे वजह ताली पीटते हैं
आतिश इंदौरी

3
कुछ फ़सादी बने और कुछ से जवानी गुजरी
ढेर किरदार थे सो एक कहानी उतरी

कट गया वक़्त वो जब सिर से ग़रीबी गुजरी
हीरे कुछ निकले जो चहरों से सियाही उतरी

छोटी सी बात पे बच्चों ने कहा मर जाओ
माँ हँसी ख़ूब मगर दिल से सुनामी गुजरी

फ़ैसला इश्क़ का इस तरह सुनाया उसने
बोला की साथ तुम्हारे यूं तो अच्छी गुजरी

कोई गाली दे भले में उसे गुल देता हूं
ज़िंदगी अच्छे से इस वजह से मेरी गुजरी
आतिश इंदौरी

4
वो कहीं जाते नहीं दिल में जगह पाते हैं
जो सलीक़े से दुआ दे के बिछुड़ जाते हैं

दिल दुआ करता हैं की घर को सलामत रखना
जब भी बेटे बहू के बोल बिगड़ जाते हैं

वक़्त लगता हैं मगर फिर से बहार आयेगी
दौर पतझड़ का हो तो बाग़ उजड़ जाते हैं

लड़कियों का तो जरूरी था भवानी बनना
हर जगह लोंचने को बाज़ नजर आते हैं

जानते थे मेरे बच्चे कि भरोसा तो दो
बूढ़ों का क्या हैं वो बहकावे में आ जाते हैं

सो परिंदों ने भी दूरी बना ली हैं आतिश
तीर लोगों की कमानों पे जो आ आते हैं
आतिश इंदौरी

5
कोशिशें कर लो मैं बादल नहीं होने वाला
बरसूँ बे-वज्ह यूँ पागल नहीं होने वाला

शर्त ये है कि हमारे ही तरह हो जाओ
मैं तो सोना हूँ मैं पीतल नहीं होने वाला

ख़्वाब टूटा तो नया ख़्वाब दिखाते हो क्यूँ
ख़्वाब ये भी तो मुकम्मल नहीं होने वाला

चाहिए पेड़ उगाने के अलावा भी कुछ
बाग़ पेड़ों से तो जंगल नहीं होने वाला

आसमाँ ٓका ये भरम तोड़ दिया आतिश ने
की करो कुछ भी वो सम-तल नहीं होने वाला
आतिश इंदौरी

6
चाहत अपनी पहले तोलो
बात कोई फिर दिल की बोलो

बात घुमाकर क्यूँ करते हो
सीधी सीधी मुझसे बोलो

छत पर रख लो तुम भी पानी
चाँद को फिर पानी में घोलो

दिल से बाहर जाना मुश्किल
कह के ये दिल के पट खोलो

चाहत तुमको मिल जायेगी
फूलों से तुम पहले हों लो
आतिश इंदौरी

7
हो न हो कुछ भी समाचार बनाना सीखो
बेचना कुछ है तो बाज़ार बनाना सीखो

गर परिंदों को बुलाना है तो अच्छा होगा
डाल सा खुद को लचकदार बनाना सीखो

अस्ल किरदार दिखाना नही लुट जाओगे
सैकड़ो तरह के किरदार बनाना सीखो

राह में खार जो आयें तो उसे गुल समझें
राह ए मंजिल यूँ मजेदार बनाना सीखो

कोई रिश्ता हैं बनाया तो निभाना भी हैं
तुम परिन्दों से सरोकार बनाना सीखो

शर्त पहली ये है गर बनना हैं नेता आतिश
झूठ के ढेर से अखबार बनाना सीखो
आतिश इंदौरी

8
पेड़ की थोड़ी छाँव ले आना
शहर लौटो तो गाँव ले आना

माँगते हैं कुहू कुहू तो दो
रोज़ की काँव काँव ले आना

मुश्किलें सामने से ले आओ
शेष सब हल्के पाँव ले आना

बात करनी है गर ग़रीबी की
राजा को नंगे पाँव ले आना

हो मज़ेदार सो गुज़ारिश है
राह में धूप छाँव ले आना
आतिश इंदौरी

Sher: सलीक़े से कभी मत खटखटाना समझ ले कि तवाइफ़ का मैं घर हूँ आतिश इंदौरी

सलीक़े से कभी मत खटखटाना
समझ ले कि तवाइफ़ का मैं घर हूँ
आतिश इंदौरी

मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

Gazal: वही बातें कहाँ हूँ और किधर हूँ यूँ तो नज़रों से उनकी तरबतर हूँ

वही बातें कहाँ हूँ और किधर हूँ
यूँ तो नज़रों से उनकी तरबतर हूँ
सुनो कि नौजवां मैं इक शजर हूँ
हुआ क्या बोन्साई जो अगर हूँ
सलीक़े से कभी मत खटखटाना
समझ ले कि किसी मुफ़लिस का घर हूँ
मुझे ग़म-ख़्वार का किरदार मत दे
कहानी में तेरी शामिल अगर हूँ
अमीरों को ग़रीबों से मिलाती
पुराने बांध की मैं इक नहर हूँ
कबाड़ी लोग दीवाने हैं आतिश
कोई मैं लौह लंगर या कटर हूँ
आतिश इंदौरी

सोमवार, 18 सितंबर 2017

Chaar Gazalen

1)
समंदर कितना गहरा देखना हैं
उसे अब कह के दरिया देखना हैं
शजर से रूठ कर ख़ुद ही गया था
कहाँ पहुँचा वो पत्ता देखना हैं
सफ़ाई से जो चिपकाये गये थे
लिखा हैं पन्नों पर क्या देखना हैं
यूँ चीख़ूँगा भले आवाज़ जाए
ज़माना कितना बहरा देखना हैं
हज़ारों में या लाखों में बिकेगा
हैं ईमां कितना महँगा देखना हैं
रहा जो सिर्फ़ मेरा ज़िंदगी भर
रहा उसका मैं कितना देखना हैं
आतिश इंदौरी

2)
आग़ हैं पर धुआँ नहीं होता
वो पढ़ों जो बयाँ नहीं होता
एक दुनिया नई बसानी हैं
शख़्स तन्हा जहाँ नहीं होता
या तो बचपन या बुढ़ापा हैं
बोन्साई जवाँ नहीं होता
दरमियाँ कोई फिर भी होता हैं
कोइ जब दरमियाँ नहीं होता
भीड़ में हूँ तो क्या हुआ आतिश
शख़्स तन्हा कहाँ नहीं होता
आतिश इंदौरी

3)
भला कब हाथ में पत्थर नहीं आया
मगर कोई निशाने पर नहीं आया
कहीं ठहरे नहीं फिर भी शिकायत हैं
सफ़र में ख़ुशनुमा मंज़र नहीं आया
मैं तौबा दोस्ती से कर तो लूँ लेकिन
हमेशा पीठ पे ख़ंजर नहीं आया
बुढ़ापे में हुआ ऐसा भी तो अक्सर
पहुँच के घर लगा की घर नहीं आया
सहा चुप-चाप तूफ़ानों को क्यूँ आतिश
कभी आँखों में क्यों सागर नहीं आया
आतिश इंदौरी

4)
पुरखों का हम मकान बेच आये
धरती और आसमान बेच आये
वो उड़ानों की बात करते हैं
जो परिँदे उड़ान बेच आये
अस्ल किरदार सामने हैं अब
जब से ख़ंजर की म्यान बेच आये
यूँ ग़ुलामी ख़रीद लाये वो
जो जो अपनी ज़बान बेच आये
क्यूँ शिकायत हो धूप से आतिश
अपना जब सायबान बेच आये
आतिश इंदौरी

रविवार, 20 अगस्त 2017

Gazal: समंदर कितना गहरा देखना हैं उसे अब कह के दरिया देखना हैं

समंदर कितना गहरा देखना हैं
उसे अब कह के दरिया देखना हैं

शजर से रूठ कर ख़ुद ही गया था
कहाँ पहुँचा वो पत्ता देखना हैं

सफ़ाई से जो चिपकाये गये थे
लिखा हैं पन्नों पर क्या देखना हैं

यूँ चीख़ूँगा भले आवाज़ जाए
ज़माना कितना बहरा देखना हैं

हज़ारों में या लाखों में बिकेगा
हैं ईमां कितना महँगा देखना हैं

रहा जो सिर्फ़ मेरा ज़िंदगी भर
रहा उसका मैं कितना देखना हैं
आतिश इंदौरी

Gazal: आसानी से पल जाते हैं जो सांचे में ढल जाते हैं aatish indori

आसानी से पल जाते हैं जो सांचे में ढल जाते हैं लम्हें मुश्किल है बतलाना ख़ामोशी में ढल जाते हैं कल फिर परसों करते करते काम यूँ बरसों टल...